एक पत्रकार की आवाज: आत्मसम्मान और न्याय की लड़ाई - विशाल तूफानी - Time TV Network

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एक पत्रकार की आवाज: आत्मसम्मान और न्याय की लड़ाई - विशाल तूफानी


पत्रकारों पर आए दिन हो रहे अत्याचार, हमलों और उत्पीड़न को लेकर राष्ट्रीय पत्रकार सहायता संघ (RPSS) के जिला उपाध्यक्ष विशाल माथुर उर्फ तूफानी ने तीखी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा — "हम पत्रकार दूसरों के दर्द को अपनी कलम से आवाज देते हैं, दूसरों के न्याय के लिए प्रशासन से सवाल पूछते हैं और पीड़ितों को इंसाफ दिलाने की हर संभव कोशिश करते हैं। तो फिर जब बात हमारे अपने सम्मान, सुरक्षा और न्याय की हो, तो हम पीछे क्यों हटें?


उनका सबाल हैं कि- क्या पत्रकार होना सिर्फ दूसरों के लिए लड़ना ही है, अपने अधिकारों के लिये नही ?


विशाल तूफानी ने सवाल उठाते हुए आगे कहा कि क्या पत्रकार की अपना कोई सम्मान, कोई अधिकार और कोई न्याय नहीं है ? देश में हर वर्ग अपने अधिकारों की आबाज उठाता है। कोई रोजगार के लिए लड़ता है, कोई राजनीतिक अस्तित्व के लिए, तो कोई व्यवस्था में बदलाव के लिए। लेकिन  देश का पत्रकार आखिर अपने हक अधिकारों के लिये ही चुप क्यों हैं और कब तक चुप रहेगा? कहा कि चौथा स्तंभ आज सबसे ज्यादा असुरक्षित और अधिकार विहीन हैं, जिसकी बजह से ही पत्रकारों पर हमले होते हैं, उनकी हत्याएं होती हैं, झूठे मुकदमों में


फंसाया जाता है, आर्थिक रूप से कमजोर किया जाता है।

सोचना होगा कि पत्रकार को सुबिधा क्या मिली हैं - न टोल टैक्स में छूट, न रेल किराए में रियायत, न सुरक्षा की गारंटी और न आय का कोई समुचित श्रोत, एक विज्ञापन उसमें भी असमानता और भेदभाव। इसके इतर कलम चलाने पर तमाम जोखिम, आखिर इन सबका जिम्मेदार हैं तो कौन ?


सबाल - आखिर दर्पण दिखाने वाला पत्रकार कब तक लूटेगा, पिटेगा, फर्जीवाड़े का शिकार होगा, तमाम तरह से प्रताड़ित होगा और बेबस असहाय की भांति पत्रकारिता के अधिकारों का हनन होते देखता रहेगा ?


क्या नहीं लगता कि आज हर पत्रकार को एकजुट होने का वक्त है?


सोचना यह भी हैं कि आज छात्र, किसान, डॉक्टर, अधिवक्ता, ड्राइबर, श्रमिक वर्ग अपने हक अधिकार की आबाज उठा सकता हैं तो पत्रकार क्यों नहीं, क्या पत्रकारिता के क्षेत्र में सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खाँ जैसे क्रांतिकारी पत्रकारों का अभाव समझें ? अगर कलम में आज भी गलत के खिलाफ क्रांति और समाज को शांति का संदेश देनें का जज्बा हैं तो अब वक्त आ गया है कि देशभर के पत्रकार एकजुट हों और एक सुर में अपने अधिकारों के लिये आगे आयें -


1. पत्रकार सुरक्षा कानून

2. निष्पक्ष और समान विज्ञापन नीति

3. पत्रकारों पर हमलों में त्वरित कार्रवाई

4. छोटे और स्वतंत्र पत्रकारों एवं समाचार पत्रों की आर्थिक सुरक्षा और मदद

के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा करें।


 जागो और न झुको न रुको, न डरो, न्याय की लड़ाई लड़ो। कलम को सच्चाई की ताकत बनाकर प्रेस को मजबूत और विश्वनीय बनाओ, उसके बाद देखना कौन कलम की  आवाज दबाता, कौन पत्रकार को प्रताड़ित करता हैं ? पत्रकार जब जागेगा तब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बचेगा ।

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