कासगंज में ‘कोख का सच’ बना कारोबार?
गलत अल्ट्रासाउंड रिपोर्टों से दहशत, CMO से शिकायत के बाद मचा हड़कंप
जनपद कासगंज में स्वास्थ्य सेवाओं की साख पर उस समय बड़ा सवाल खड़ा हो गया जब एक ही गर्भवती महिला की तीन अलग-अलग अल्ट्रासाउंड रिपोर्टों ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया। मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि जिंदगी से खिलवाड़, मेडिकल माफिया और जांच के नाम पर चल रहे धंधे की ओर इशारा कर रहा है।
किसरौली निवासी प्रदीप द्वारा मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजीव अग्रवाल को दी गई लिखित शिकायत ने जिले के निजी अस्पतालों और अल्ट्रासाउंड सेंटरों में चल रहे कथित ‘कोख के काले कारोबार’ की परतें खोल दी हैं।
पहला झटका – गर्भ में ब्लड के धब्बे
पीड़ित प्रदीप के मुताबिक उन्होंने अपनी पत्नी का पहला अल्ट्रासाउंड सिद्ध विनायक हॉस्पिटल में कराया।
रिपोर्ट आई तो पैरों तले जमीन खिसक गई —
1- गर्भ में ब्लड के धब्बे
2- गर्भ पर खतरे की आशंका
परिवार में मातम जैसा माहौल हो गया। घर में दहशत, आंखों में आंसू और दिमाग में सिर्फ एक सवाल — क्या बच्चा सुरक्षित है?
2-दूसरी रिपोर्ट – सब नॉर्मल है
पहली रिपोर्ट पर शक हुआ तो जांच कराई पारस हॉस्पिटल में।
यहां जो रिपोर्ट मिली उसने पहली रिपोर्ट को पूरी तरह झूठा साबित कर दिया
1- गर्भाशय सामान्य
2- कोई ब्लीडिंग नहीं
3- सब कुछ ठीक
अब सवाल उठना शुरू हुआ ……कौन सच बोल रहा है?
कौन झूठ? …या दोनों जगह खेल हुआ?
3- तीसरी रिपोर्ट – गर्भ में भ्रूण मौजूद
परिवार पूरी तरह आश्वस्त होना चाहता था। तीसरी बार जांच कराई गई रतन दुलारो हॉस्पिटल में।
इस रिपोर्ट ने पूरे मामले को और रहस्यमय बना दिया - गर्भाशय में भ्रूण होने की पुष्टि
अब तीन अस्पताल… तीन रिपोर्ट… और तीन अलग-अलग सच्चाई।
सवाल जो पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा करते हैं
यह सिर्फ एक परिवार का मामला नहीं है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर आरोप है —
! क्या कासगंज में अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट पैसे के हिसाब से बन रही हैं?
! क्या मरीजों को जानबूझकर डराकर बार-बार जांच के लिए भेजा जाता है?
! क्या बिना विशेषज्ञ डॉक्टरों के चल रहे हैं सेंटर?
! क्या मशीनें मानक के अनुसार नहीं हैं?
! क्या भ्रूण जांच को लेकर कोई बड़ा खेल चल रहा है?
जिंदगी से खिलवाड़ या मेडिकल माफिया?
विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था में गलत अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट —
गलत दवा दिला सकती है
अनावश्यक ऑपरेशन करा सकती है
गर्भपात तक की नौबत ला सकती है
मां और बच्चे दोनों की जान जोखिम में डाल सकती है
यानी यह सिर्फ लापरवाही नहीं — सीधा-सीधा जानलेवा अपराध है।
पीड़ित परिवार का दर्द
प्रदीप का कहना है
अगर समय रहते सही रिपोर्ट न मिलती तो मेरी पत्नी और बच्चे की जान भी जा सकती थी। ये अस्पताल इलाज नहीं, जिंदगी से खेल रहे हैं।
परिवार अब भी सदमे में है।
रातों की नींद उड़ चुकी है।
हर रिपोर्ट पर भरोसा टूट चुका है।
कासगंज के अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर पहले भी उठते रहे सवाल
सूत्रों की मानें तो जिले में कई सेंटर —
1- बिना मानक के चल रहे हैं
2- टेक्नीशियन के भरोसे मरीजों की जांच
3- डॉक्टर सिर्फ नाम के
4- रिपोर्ट कॉपी-पेस्ट सिस्टम
और यही वजह है कि अब यह मामला स्वास्थ्य विभाग की बड़ी जांच का कारण बन सकता है।
CMO ऑफिस में शिकायत – मचा हड़कंप
जैसे ही शिकायत मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजीव अग्रवाल तक पहुंची
जांच के आदेश
संबंधित अस्पतालों से जवाब तलब
रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे
मशीनों की जांच होगी
डॉक्टरों की योग्यता देखी जाएगी
अगर आरोप सही पाए गए तो
लाइसेंस निरस्त
सेंटर सील
FIR दर्ज
जेल तक की कार्रवाई
किन धाराओं में हो सकती है कार्रवाई?
कानूनी जानकारों के अनुसार
क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट
पीसीपीएनडीटी एक्ट (यदि भ्रूण जांच में गड़बड़ी मिली)
धोखाधड़ी
जान से खिलवाड़
जैसी गंभीर धाराएं लग सकती हैं।
स्वास्थ्य विभाग की साख पर बड़ा सवाल
यह मामला सिर्फ तीन अस्पतालों तक सीमित नहीं है।
यह सवाल है -
जिले की मॉनिटरिंग पर
स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर
फर्जी जांच के नेटवर्क पर
जनता में आक्रोश
स्थानीय लोगों का कहना है
अगर कोख में पल रहे बच्चे की रिपोर्ट तक फर्जी हो सकती है तो आम मरीज किस पर भरोसा करे?
कासगंज में कोख का सच बना कारोबार…
तीन अस्पताल… तीन रिपोर्ट…
और जिंदगी के साथ खतरनाक खिलवाड़…
क्या मरीजों को डराकर चल रहा है जांच का धंधा?
क्या अल्ट्रासाउंड सेंटर बन गए हैं मौत के सौदागर?
देखिए हमारी ये सनसनीखेज रिपोर्ट… यह सिर्फ एक शिकायत नहीं - बड़ा खुलासा हो सकता है
अगर निष्पक्ष जांच हुई तो सामने आ सकते हैं —
फर्जी रिपोर्ट गिरोह
कमीशन का खेल
मरीजों को रेफर करने का रैकेट
बिना रजिस्ट्रेशन चल रहे सेंटर
अब सबकी नजरें CMO की जांच पर टिकी हैं।
क्या होगी कार्रवाई?
क्या सील होंगे अस्पताल?
या फिर फाइलों में दब जाएगा मामला?
निष्कर्ष -कोख की सुरक्षा या कारोबार?
कासगंज का यह मामला सिर्फ मेडिकल लापरवाही नहीं
इंसानियत को झकझोर देने वाला स्वास्थ्य घोटाला बन सकता है।
क्योंकि यहां सवाल एक रिपोर्ट का नहीं
एक मां की जिंदगी का है
एक अजन्मे बच्चे का है
और पूरे सिस्टम की सच्चाई का है।






