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शिक्षा की लूट के खिलाफ उबल पड़ा शहर -गांधी मूर्ति पर अनिश्चितकालीन धरना, प्रशासन पर गंभीर आरोप

 कासगंज शहर का नदरई गेट इलाका उस समय जंग के मैदान में तब्दील हो गया जब सैकड़ों अभिभावक, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षा को लूट से मुक्त करो” के नारों के साथ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए। धरना स्थल बना महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास का प्रमुख चौराहा। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के रूप में शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त कथित घोटालों, दबाव, कमीशनखोरी और निजी प्रकाशनों की सांठगांठ के गंभीर आरोपों के साथ एक बड़े खुलासे का रूप लेता जा रहा है।


क्या है लोगों की मांग?

धरने पर बैठे लोगों की तीन प्रमुख मांगें हैं-

स्कूलों में केवल NCERT की पुस्तकें लागू की जाएं।

निजी प्रकाशनों की अनिवार्यता तत्काल समाप्त की जाए।

स्कूल ड्रेस नीति कम से कम 3–5 वर्षों तक स्थिर की जाए, हर साल बदलाव पर रोक लगे।

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि शहर के कई निजी और कुछ अर्द्धसरकारी स्कूलों में बच्चों पर महंगी निजी प्रकाशनों की किताबें खरीदने का दबाव बनाया जाता है। यही नहीं, हर साल ड्रेस बदलने की परंपरा ने अभिभावकों की जेब पर डाका डाल रखा है।

शिक्षा के नाम पर संगठित वसूली- मंच से लगे आरोप

धरना मंच से कई वक्ताओं ने दावा किया कि शिक्षा के नाम पर एक संगठित वसूली तंत्र काम कर रहा है। आरोप है कि कुछ स्कूल प्रबंधन और निजी प्रकाशन आपस में मिलकर किताबों की सूची तय करते हैं, जिनकी कीमत बाजार दर से कई गुना अधिक होती है। अभिभावकों को खुले बाजार से खरीदने की छूट नहीं दी जाती, बल्कि “निर्धारित दुकानों” से ही खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है।


एक अभिभावक ने मंच से कहा

अगर हम बाहर से किताब खरीदने की कोशिश करें तो कहा जाता है कि वही संस्करण मान्य नहीं होगा। आखिर ये कैसा नियम है? ये सीधा-सीधा आर्थिक अपराध है।


ड्रेस बदलने का खेल — हर साल नया बोझ

धरना स्थल पर मौजूद कई माताओं ने आरोप लगाया कि पिछले चार वर्षों में तीन बार स्कूल ड्रेस बदली गई। नई ड्रेस केवल अधिकृत विक्रेता से ही खरीदने की शर्त रखी गई। उनका कहना है कि यह व्यवस्था पारदर्शी नहीं है और इसमें मोटे कमीशन का खेल हो सकता है।

एक प्रदर्शनकारी महिला ने कहा,

पहले किताबों में लूट, फिर ड्रेस में लूट, फिर सालाना फंड, स्मार्ट क्लास फीस, एक्टिविटी चार्ज - आखिर गरीब और मध्यम वर्ग का परिवार कैसे जिए?

क्या यह सिर्फ आर्थिक मामला है या संगठित अपराध?

धरने के आयोजकों का दावा है कि यह मामला सिर्फ महंगी किताबों या ड्रेस तक सीमित नहीं है। उनका आरोप है कि—

स्कूल प्रबंधन द्वारा कथित तौर पर अभिभावकों को दबाव भरे संदेश भेजे जाते हैं।

शिकायत करने वाले अभिभावकों के बच्चों के साथ भेदभाव की आशंका जताई जाती है।

कुछ मामलों में TC (ट्रांसफर सर्टिफिकेट) देने में अनावश्यक देरी की जाती है।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मंच से बार-बार यह कहा गया कि यदि प्रशासन ने जांच नहीं की तो बड़े स्तर पर दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएंगे।

 प्रशासन ने शांति बनाए रखने की अपील की है, लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक लिखित आश्वासन नहीं मिलेगा, वे हटने वाले नहीं हैं।

सूत्रों के अनुसार, शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारी अंदरखाने बैठकों में जुटे हैं। हालांकि आधिकारिक बयान में कहा गया है कि यदि कहीं अनियमितता है तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी।

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ आंदोलन

धरने के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। “#शिक्षा_की_लूट” और “#NCERT_लागू_करो” जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे हैं। कई स्थानीय संगठनों और छात्र समूहों ने भी समर्थन की घोषणा की है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

शिक्षा नीति से जुड़े जानकारों का मानना है कि NCERT की पुस्तकें लागू करना राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता और लागत नियंत्रण में सहायक हो सकता है। हालांकि निजी स्कूलों को कुछ शैक्षणिक स्वतंत्रता भी प्राप्त है। लेकिन यदि किसी प्रकार की बाध्यता या कमीशनखोरी साबित होती है, तो यह गंभीर वित्तीय अनियमितता और उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।


कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि-

यदि स्कूल किसी विशेष दुकान से खरीदने के लिए बाध्य करते हैं, तो यह प्रतिस्पर्धा कानून के दायरे में जांच का विषय बन सकता है।

अनावश्यक शुल्क वसूली उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत चुनौती दी जा सकती है।

धरना स्थल पर भावनाओं का विस्फोट

धरने के तीसरे दिन माहौल और भी उग्र दिखा। मंच से “शिक्षा माफिया होश में आओ” जैसे नारे लगे। कुछ युवाओं ने आरोप लगाया कि शिक्षा अब सेवा नहीं, व्यापार बन चुकी है।

हालांकि आयोजकों ने बार-बार अपील की कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा और किसी भी प्रकार की हिंसा से दूरी रखी जाएगी।

क्या आगे बड़ा खुलासा?

धरना समिति ने दावा किया है कि उनके पास किताबों की कीमत, प्रकाशन अनुबंध और ड्रेस सप्लाई से जुड़े कुछ दस्तावेज हैं, जिन्हें वे उचित मंच पर प्रस्तुत करेंगे। यदि ये दस्तावेज सामने आते हैं तो शहर की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा भूचाल आ सकता है।

आम जनता की राय

स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि यदि केवल चुनिंदा दुकानों को किताबें और ड्रेस बेचने का अधिकार दिया जाता है तो यह बाजार की निष्पक्षता के खिलाफ है। वहीं कुछ अभिभावक यह भी मानते हैं कि सभी स्कूल एक जैसे नहीं हैं और पूरे तंत्र को अपराधी करार देना उचित नहीं होगा।

निष्कर्ष- क्या बदलेगा शिक्षा का समीकरण?

नदरई गेट पर शुरू हुआ यह अनिश्चितकालीन धरना अब सिर्फ तीन मांगों का आंदोलन नहीं रहा, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल बन गया है।

क्या स्कूलों में वाकई निजी प्रकाशनों की अनिवार्यता खत्म होगी?

क्या ड्रेस नीति को स्थिर किया जाएगा?

क्या कथित आर्थिक अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच होगी?

इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा। फिलहाल शहर की नजरें गांधी मूर्ति के नीचे बैठे उन अभिभावकों पर टिकी हैं, जो दावा कर रहे हैं कि वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए लड़ रहे हैं — और यह लड़ाई अब आर-पार की है।

धरना जारी है। प्रशासन पर दबाव बढ़ रहा है। और शिक्षा की इस जंग ने पूरे शहर को हिला कर रख दिया है।

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